शिवराज के लिए अगला मंत्रिमंडल विस्तार किसी चुनौती से कम नहीं

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कोरोना महामारी के संकट से निपटने के लिए पांच नये साथियों का चयन कर भले ही फौरी तौर पर क्षेत्रीय, जातिगत और विभिन्न वर्गों को साधने में महारत दिखाई हो, लेकिन लॉकडाउन खत्म होने के बाद जब वे अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे तो उसमें इस प्रकार का संतुलन बिठाना उनके लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं रहेगा। फिलहाल अभी तो मंत्री पद के दावेदार अपने पुराने संगी-साथियों को उन्होंने भले ही टीम से बाहर रखा हो लेकिन जब बड़ा विस्तार होगा तब ऐसा करना उनके लिए आसान नहीं रहेगा। खासकर ऐसी परिस्थितियों में जबकि कांग्रेसी कुनबे से आये लोगों का समावेश करने के बाद क्षेत्रीय और जातिगत समीकरण बिठाना बड़ा कठिन काम होगा, क्योंकि भाजपा में ही तीन दर्जन से अधिक ऐसे विधायक हैं जिन्हें एडजस्ट करना संभव नहीं होगा। जबकि खाली बचे हुए स्थानों की संख्या सीमिति रहेगी। यदि लगभग दो दर्जन के आसपास लोगों को शिवराज अपनी पहली खेप की टीम में शामिल करेंगे तो सबको कैसे साध पायेंगे जिसकी महारत भी उनके इस विस्तार में देखने को मिलेगी। यदि वे उपचुनावों के बाद केवल चार-पांच सीटें ही खाली छोड़ते हैं तो फिर उन्हें कुछ आसानी हो जाएगी। मंत्रियों को संभाग का प्रभार देने और विभागों के बंटवारे में शिवराज के बाद सबसे शक्तिशाली मंत्री के रुप में डॉ. नरोत्तम मिश्रा उभर कर सामने आये हैं तो वहीं सिंधिया समर्थक गोविंदसिंह राजपूत को ग्वालियर-चम्बल संभाग का प्रभार दिया गया है। यह प्रभार यदि उपचुनावों तक परिवर्तित नहीं होता है तो फिर उपचुनावों की दृष्टि से कांग्रेस को भी इस अंचल में अपनी मजबूत जमावट करना होगी। कांग्रेस ने नेता प्रतिपक्ष के रुप में डॉ. गोविंद सिंह को जिम्मेदारी देने का पक्का मन बना लिया ताकि ग्वालियर-चंबल संभाग में चुनावी लड़ाई को अधिक रोचक बनाया जा सके। डॉ. सिंह तीखे समाजवादी तेवरों वाले नेता हैं और इस समय महल बनाम जनता की लड़ाई में उनसे अधिक कोई दूसरा उपयुक्त चेहरा इस अंचल में कांग्रेस के पास नहीं है।
शिवराज यह बात भलीभांति जानते हैं कि उन्होंने जो विभागों का वितरण किया है उसमें कुछ महत्वपूर्ण विभाग मंत्रियों को सौंप दिए गए हैं जबकि कई अनुभवी और वरिष्ठ विधायक जो उनकी सरकार में मंत्री रह चुके हैं उनमें किसी प्रकार का असंतोष न पनपे इसके लिए उन्होंने विभाग वितरण के साथ ही यह बात साफ कर दी कि विभागों का यह बंटवारा केवल कोरोना संकट के मद्देनजर ही किया गया है। उनके यह कहने का जानकार हलकों में यह अर्थ निकाला जा रहा है कि वरिष्ठों में जो लोग अभी मंत्री नहीं बन पाये हैं वे फिलहाल निराश न हों। वैसे कोरोना संकट के मुकाबले के साथ ही फिलहाल उपचुनावों को भी ध्यान में रखा गया है। प्रदेश में जो 24 उपचुनाव होने हैं उनमें से चम्बल संभाग के बाद सबसे अधिक उपचुनाव इंदौर-उज्जैन संभाग में ही होंगे। तुलसी सिलावट को जल संसाधन जैसा विभाग सौंपा गया है जिसे पाने की हसरत हर वरिष्ठ व मुख्यमंत्री के नजदीकी व्यक्ति की होती है। सिलावट को इंदौर और सागर संभाग का प्रभारी बनाया गया है। सागर संभाग में भी विधानसभा उपचुनाव होना है। कमलनाथ सरकार की तुलना में सिलावट को अधिक महत्व का विभाग मिला है, लेकिन उनकी पुरानी पार्टी कांग्रेस के नेता चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि कोरोना की असली जंग प्रदश में लड़ी जाना है और उसका दारोमदार स्वास्थ्य विभाग पर है, वह विभाग पाने में वे असमर्थ रहे हैं। कहां वे उपमुख्यमंत्री बनने चले थे और हुआ ऐसा वे अपना पूर्व का स्वास्थ्य विभाग ही नहीं बचा पाये। इसी प्रकार गोविंद सिंह राजपूत को खाद्य, नागरिक आपूर्ति, उपभोक्ता संरक्षण तथा सहकारिता विभाग मिला है जो पहले से ही ज्योतिरादित्य सिंधिया के कोटे में था। राजपूत कमलनाथ सरकार में अधिक शक्तिशाली थे क्योंकि उनके पास राजस्व व परिवहन जैसा अहम् विभाग था, जिससे वे वंचित हो गए हैं। कमल पटेल को भी इस समय चुनौती वाला खेती किसानी से जुड़ा कृषि विभाग मिला है। किसानों के मौजूदा हालातों को देखते हुए उन्हें जिस पैमाने पर राहत पहुंचाना है वह काम इसी विभाग के अंतर्गत आता है। इस प्रकार डा. मिश्रा के बाद कमल पटेल को तुलनात्मक रुप से अधिक महत्व मिला है। आदिम जाति कल्याण जैसा बड़ा विभाग मीना सिंह को मिला है जो सीधे-सीधे राष्ट्रीय स्वयं संघ और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी. शर्मा की विश्‍वासपात्र हैं।
अंतत: मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश की कमान संभालने के 29 दिन बाद अपनी टीम में पांच नये मंत्रियों को शामिल करते हुए मिनी विस्तार में प्रदेश के विभिन्न अंचलों और सामाजिक समीकरणों तथा वर्गों को एक साथ साधने की कला में महारत दिखाई है। इसके साथ ही छोटे और बड़े विस्तार को लेकर पिछले कुछ दिनों से जो अनुमान लगाये जा रहे थे उसके उलट अपने अति विश्‍वसनीय साथियों के स्थान पर जो नाम शामिल किए हैं वे चौंकाने वाले हैं। जिस प्रकार केन्द्रीय मंत्रिमंडल के गठन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया में चल रहे कुछ प्रमुख नामों को दरकिनार करते हुए लोगों को चौंकाया था उसी मोदी शैली को अपनाते हुए शिवराज ने भी कोरोना महामारी के संकट से निपटने के लिए छोटी टीम बनाई है। कुछ वरिष्ठ दावेदारों को इसमें शामिल न कर फिलहाल कोई असंतोष न फैले उसका पुख्ता इंतजाम किया और साथ ही अनुभवी चेहरों को भी लिया जिसमें से अधिकांश अपनी प्रशासनिक क्षमता में दक्ष रहे हैं। किसी नये नवेले या कम अनुभवी को शामिल न कर फिलहाल उन्होंने ऐसा कोई प्रयोग नहीं किया है जो चुनौती से निपटने के प्रति उनकी गंभीरता को कम आंक सके। मोदी शैली में चौंकाने वाला विस्तार करने की यह परम्परा कितनी आगे जारी रहेगी यह दूसरे विस्तार में ही पता चलेगा जबकि कुछ अनजान चेहरे मंत्रिमंडल में शामिल होंगे और जिनकी वापसी पक्की समझी जा रही है उन्हें जगह नही मिल पायेगी। जो नये लोग शामिल हुए हैं उनमें क्रमश: डॉ.नरोत्तम मिश्रा, तुलसी सिलावट, कमल पटेल, गोविन्दसिंह राजपूत और मीना सिंह में से सभी कभी न कभी मंत्री रह चुके हैं। इनमें से डॉ. नरोत्तम मिश्रा, कमल पटेल पूर्व में अपने-अपने विभागों में मजबूत पकड़ रखने वाले मंत्री रहे हैं तो वहीं तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत कमलनाथ सरकार में प्रभावी मंत्री रहे हैं। मीना सिंह राज्यमंत्री रही हैं और अब उनके सामने यह चुनौती है कि केबिनेट मंत्री के रुप में वे इन कठिन परिस्थितियों में अपनी कितनी कार्यदक्षता सिद्ध कर पाती हैं। डॉ. मिश्रा भाजपा में एक बड़ा ब्राह्मण चेहरा हैं और वे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के विश्‍वासपात्र हैं। शिवराज सिंह चौहान की सरकारों में वे हमेशा एक संकटमोचक की भूमिका का निर्वहन करते रहे हैं और पुन: प्रदेश में भाजपा सरकार पदारुढ़ कराने में उनकी महत्वपूूर्ण भूमिका रही है। वे एक परिणामोन्मुखी और नेता की हर कसौटी पर खरे उतरने में माहिर हैं। राज्य के बाहर भी उन्हें अमित शाह ने जो भी चुनावी जिम्मेदारी सौंपी उनमें उनका प्रदर्शन काफी अच्छा रहा है।
और यह भी
शिवराज की छ: सदस्यीय टीम में जो पांच नये चेहरे शामिल किए गए हैं उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जो उनका अपना भरोसेमंद और करीबी माना जाए। डॉ. मिश्रा और कमल पटेल केंद्रीय नेतृत्व की पसंद हैं तो मीना सिंह संघ और प्रदेश अध्यक्ष की। सिलावट और राजपूत के लिए तो उनका हाईकमान केवल और केवल ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। मंत्रि परिषद में भूपेंद्र सिंह और रामपाल सिंह का न आ पाना यह बताने के लिए काफी है कि शिवराज का कोई पसंदीदा इस छोटी टीम में नहीं है। हालांकि इससे शिवराज के आभामंडल या पकड़ पर कोई विशेष असर नहीं पड़ता क्योंकि मुख्यमंत्री तो मुख्यमंत्री ही होता है, लेकिन यदि पसंदीदा एक-दो साथी भी न आ पाये तो फिर इसको लेकर चटकारेदार चर्चा राजनीतिक गलियारों में होने लगती है।●अरुण पटेलले,खक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।◆संपर्क- 09425010804, 07389938090


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