विशेष संपादकीय: सफलता और असफलता हैं एक सिक्के के दो पहलू

यह एक सहज मानवीय स्वभाव हैं कि हर व्यक्ति केवल सफलता चाहता है और कोई भी असफल नहीं होना चाहता लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सफलता और असफलता एक सिक्के के ही दो पहलू हैं। यह एक रेखा गणित के स्वयं सिद्ध की तरह स्थापित है कि दुनिया में जो व्यक्ति सफलता के शीर्ष पर अपने-अपने क्षेत्रों में पहुंचे हैं वे कभी ना कभी जीवन के किसी मोड़ पर असफल ना हुए हो। एक बार की असफलता के बाद जो व्यक्ति निराश नहीं होता और लगातार सफलता के प्रयास करता रहता है वह एक न एक दिन अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है और अपनी मंजिल तक पहुंच ही जाता है। इसके लिए जरूरी है केवल लगातार बिना फल की चिंता किए निस्वार्थ कर्म में लगे रहना और लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में प्रयास करते रहना। जो व्यक्ति ऐसा करता है एक ना एक दिन सफलता उसके कदम चूमती ही है। इस कहावत को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए ‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’। सफलता कि जो सूत्र विश्‍व के प्रसिद्ध चिंतकों और लेखकों ने बताए हैं उसमें भी साफ तौर पर कहा गया है कि एक बार मिली असफलता स्थाई तौर पर नहीं होती है बल्कि लगातार लगन और मेहनत से आगे चलकर हम अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। असफलता से निराश होने की कतई आवश्यकता नहीं है, बल्कि हमें गहन चिंतन मनन करना चाहिए कि हमारे प्रयासों में कहां कमी रह गई या क्या कमजोरी थी  और उसे समझकर दूर कर यदि एकाग्रता से प्रयास करेंगे तो हमें एक दिन अवश्य सफलता मिलकर ही रहेगी।
श्रीअरविंद आश्रम पुडुच्चेरी की श्रीमां ने विस्तार से सफलता और असफलता पर प्रकाश डाला है और वे कहती हैं कि जो लोग अपने अनित्य, समग्र जीवन से अधिक फल पाना चाहते हैं उनके लिए वर्तमान क्षण की तुष्टि को अपने आदर्श की  उपलब्धि के लिए त्यागने की विधि जानना बहुत बड़ी कला है। सफल लोगों की अनगिनत श्रेणियां हैं। उनका निर्धारण उनके आदर्श की कम या अधिक विशालता, उदात्तता, जटिलता, पवित्रता और प्रकार के अनुसार होता है। कोई फटे पुराने कपड़े बटोरने और बेचने में सफल हो सकता है तो कोई समस्त संसार का मालिक अथवा पूरी तरह से वैरागी होने में सफल हो सकता है। ये तीनों उदाहरण यदि देखें जाएं तो एक दूसरे से बहुत अधिक स्तरों के हैं, व्यक्ति का न्यूनाधिक पूर्ण और विस्तृत आत्म-संयम ही सफलता को संभव बनाता है। हम श्रीमां के विचारों के आलोक में देखेंगे तो पाएंगे कि दूसरी ओर  असफल होने का केवल एक ही मार्ग है और यह बड़े से बड़े, सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमानों के लिए तथा छोटे से छोटे तथा अत्यंत सीमित बुद्धिवालों के साथ और उन सभी के साथ होता है जो वर्तमान के संवेदन को अपने अभिप्रेत लक्ष्य के अधीन नहीं कर सकते। वे लक्ष्य तो चाहते हैं पर उनमें उसका मार्ग अपनाने का बल नहीं होता। उपलब्धि तक ले जाने वाला मार्ग अपने विस्तार और जटिलता में तो नहीं पर प्रकृति में सबके लिए समान होता है।
एक छोर पर वह व्यक्ति होता है जिसने जो कुछ सोचा था वह पूरी तरह पा लिया और दूसरे छोर पर है वह है जो कुछ भी पाने में असमर्थ रहा। नि:संदेह, इन दोनों के बीच असीम मध्यवर्ती श्रेणियां है। ये श्रेणियां बहुत जटिल हैं क्योंकि लक्ष्य की उपलब्धि में बहुत सारे दर्जे ही नहीं, बल्कि लक्ष्य के विविध गुणों में भी भेद होता है। कुछ ऐसी महत्वाकांक्षाएं है, जो केवल निजी हितों, भौतिक, भावनागत या बौद्धिक हितों की खोज करती हैं। कुछ अन्य ऐसी है जिनके लक्ष्य अधिक व्यापक, अधिक सामुदायिक या ज्यादा ऊंचे होते हैं। कुछ ऐसे भी लक्ष होते हैं जिनके बारे में हम कह सकते हैं, कि मनुष्य से ऊपर के हैं, जो उन शिखरों पर जाना चाहते हैं जो शाश्‍वत सत्य चेतना और शांति की भावनाओं में जा खुलते हैं। यह समझना तो आसान होगा कि व्यक्ति के त्याग और प्रयास उसके चुने हुए लक्ष्य की विशालता और उच्चता के अनुरूप होना चाहिए। अत्यंत सामान्य से लेकर लोकातीत तक, किसी भी स्तर पर, उस व्यक्ति को, जिसने कोई लक्ष्य चुना हो, कदाचित आत्म- संयम और उपलब्ध यज्ञ शक्ति के योग फल और हर प्रकार के त्याग के योगफल में पूर्ण संतुलन मिलता होगा। जब किसी व्यक्ति की संरचना पूर्ण संतुलन को संभव बनाती है तो उसका पार्थिव जीवन अपना अधिक से अधिक परिणाम लाता है। हर चीज सब की है। यह कहना या सोचना कि यह चीज मेरी है, एक ऐसा अलगाव पैदा करता है, एक ऐसा भेद लाता है जो कि वास्तविकता में नहीं है। हर चीज सबकी है, यहां तक कि जिस द्रव्य से बने हैं वह भी सब का है। यह परमाणुओं का एक भंवर है जो हमेशा घूमता रहता है। वह किसी एक का हुए बिना क्षणिक रूप में आज के लिए हमारे संघटन को गठित करता है, कल वह कहीं और होगा। ...जो यह कहते हैं यह विचार मेरा है और जो सोचते हैं कि वे औरों को उससे लाभ उठाने देते हैं और यह उनकी उदारता है तो वास्तव में ऐसे लोग मूर्ख की श्रेणी में आते हैं। सही मायने में देखा जाए तो विचारों का जगत सबका है, यथार्थ यही है कि बौद्धिक शक्ति वैश्‍विक सकती है। श्रीमां ने हमें बताया है कि हम प्रणालियों की तरह हैं। उनमें जो कुछ आता है उसे अगर खुले रूप में बहने न दिया जाए तो फिर प्रणालियां ही बंद हो जाती है और आगे से कुछ नहीं आता है बल्कि उसमें जो कुछ है वह भी सड़ जाता है। इसके विपरीत अगर हम प्राणिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक बाढ़ को खुले तौर पर बहने दे, अपने आप को महत्व देते हुए, अपने छोटे से व्यक्तित्व को महान वैश्‍विक धरा  के साथ जोड़ सके तो हम जो कुछ देंगे उससे गुना अधिक पाएंगे। योग एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा हम अपने अवचेतन मस्तिष्क को जागृत कर जो भी करना चाहते हैं उसके चमत्कारिक नतीजे पा सकते हैं। योग के द्वारा असाध्य से असाध्य दिखने वाले लक्ष्य को हम प्राप्त कर सकते हैं। अपनी असफलता को सफलता में बदलने के लिए हमारे अवचेतन मन की शक्तियां सबसे कारगर होती है बशर्ते कि हम योग साधना के द्वारा उन्हें जागृत कर सके और जो कुछ जीवन में पाना चाहते हैं उसके संदेश उसी भावना के साथ भेजें जो हम बनना चाहते हैं। हमारे अवचेतन मन की यह विशेषता है कि वह वही समझता है और वही करता है जो हम उसे कहते हैं सकारात्मक संदेश देंगे तो हमें उसके सकारात्मक नतीजे मिलेंगे। मैं सफल हूँ यह दोहराते हुए क्या पाना चाहते हैं यह बात निरंतर दोहराते रहे। हमेशा याद रखें कि सुबह उठते समय का ब्रह्म मुहूर्त सबसे उपयुक्त होता है जो कुछ अपने अवचेतन मस्तिष्क तक पहुंचाना चाहते हैं पहुंचा सकते हैं। जहां तक योग का सवाल है योग की यात्रा लंबी और श्रमसाध्य है। इसमें आगे बढ़ने के लिए तैयारी करना होती और यह हमारे अंदर कुछ ऐसे विशेष गुण और मनोवृति को विकसित करने में सहायक होता है जिनकी योग पथ पर हमें नितांत आवश्यकता होती है। यही संदेश है हमें श्रीमां ने भी दिया है।


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