परंपराएं हुई पोर्टेबल:रस्मों को निभाने के लिए खिलौनों के स्वरूप मेें बदल गई है सामग्री:१0-१२ दिन का विवाह अब २-३ दिन में हो जाता है संपन्न

आगर-मालवा, सत्यनारायण शर्मा । हरे बांस, ज्वार की पिडियां, आम के पत्ते अब मंडप गाडने के लिए आवश्यक नहीं होते। टैंट हाऊस से लाई गई चार सीलिंग एक कनात लगी और झटपट मंडप तैयार हो जाता है। शादी की परंपराओं के निर्वहन के लिए दर्जनों वस्तुएं एकत्रित कर लाना पडती थी। लेकिन आधुनिकरण की आंधी में परंपराएं सिर्फ पूरी करने के लिए रह गई है। रस्मों को निभाने के लिए सारी वस्तुएं खिलौनों में तब्दील हो चुकी है। हालात यह है कि १0-१२ दिन की शादी अब २-३ दिन में सिमट गई है। कोविड काल के बाद बाजार एक बार फिर लग्नसरा के इस सीजन हेतु सज-धज कर तैयार है। बाजार की रंगत को जांचने के लिए शब्द संचार ने जब नगर की वैवाहिक सामग्रियों वाली दुकानों का जायजा लिया तो समझ में आया कि परंपराएं अब पोर्टेबल हो गई है। 

कोरोना ने आदमी का जीवन बदलकर रख दिया है। विवाह जीवन का सबसे बडा संस्कार माना जाता है। बदलाव की बयार ने इस संस्कार को भी परिवर्तित कर दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में विवाह १0-१२ दिन के होते थे। घर परिवार और दोस्तों में यहां दाने झेले जाते थे। दूल्हे के लिए रोज फूलों से बनी हुई माला, पान लाये जाते थे। हाथ से कुटी हुई मेंहदी व हल्दी रचाई जाती थी। भागमभाग भरी जिदंगी में लगभग सभी परंपराएं ओझल सी हो चली है। विवाह जैसे संस्कार में कई वस्तुओं की आवश्यकता पडती थी। जिनको यहां-वहां से एकत्रित किया जाता था। पहले से ही बांस, ज्वार की पिडियों का इंतजाम किया जाता था ताकि मंडप बनाने में असुविधा न हो। लेकिन अब सब कुछ सिमट गया है। दीपपर्व के बाद बाजार में खासी रंगत है। नवंबर-दिसंबर के साथ जनवरी-फरवरी और मार्च में भी शादियों की भरमार है। कोरोना प्रोटोकाल की वजह से जो शादियां रूकी हुई थी वे भी इसी माह नवंबर में होना है। इस लिहाज से नवंबर के अंतिम दो सप्ताह में जमकर शहनाई बजेगी। हालात यह है कि इन दो सप्ताह में बैड-बाजा, कैटरिंग व धर्मशालाएं सभी फूल है।

इसके बावजूद आगामी माह के कार्यक्रम को बुक करने के लिए हिचकिचाहट बरकरार है। तीसरी लहर आयेगी या नहीं इसी आशंका के चलते सभी लोग फूंक-फूंककर कदम रख रहे है। पिछले दो विवाह सीजन के दौरान शादी से जुडे सभी व्यवसायियों को बयाना वापस करना पडा था। वैवाहिक सामग्री विक्रेता बंशी पालीवाल, गौरव पालीवाल व थोक सामग्री विक्रेता अमित गुप्ता, प्रवीण गुप्ता ने शब्द संचार को बताया कि विवाह संस्कार में किन-किन सामग्रियों का इस्तेमाल होता है और वे अब वे किन स्वरूपों में मिल रही है।

अलग-अलग छपते थे कार्ड और पत्रिकाएं

घर परिवार और सामाजिक लोगों को शादी में आमंत्रित करने के लिए पत्रिका देने का चलन था जबकि दोस्तों, मित्रों और परिचितों को बुलाने के लिए कार्ड दिया जाता था। अब देखने में आता है कि लगभग एक जैसे कार्ड या पत्रिका ही सभी लोगों को वितरित कियेे जाते है। हल्दी, मेहंदी, माता पूजन, गणेश पूजन व सांस्कृतिक कार्यक्रमों की छोटी से पर्ची परिवार वालों को अलग से दी जाती है।

 

मंडप पर मिलता था दामादों को नेग

मंडप की सारी व्यवस्थाएं जुटाने का जिम्मा दूल्हा-दुल्हन के भाईयों और दोस्तों का होता था। घर के दामादों की उपस्थिति इस दिन अनिवार्य रहती थी। परिवार के लोग मंडप का पूजन करते और दामादों को नेग मिलता था। कलश सजाया जाता था। घर की बुजुर्ग महिलाएं जौ से कलश सजाया करती थी लेकिन अब बांस और ज्वार की पिडियों की जरूरत खत्म हो गई है। टेंट हाउस वाला चार पाईप लगाकर रेडीमेड मंडप तैयार कर देता है। 

खलमिट्टी के लिए आवश्यक बांस की टोकरियां

खलमिट्टी के लिए बांस की रंग-बिरंगी बांस की टोकली बनाई जाती थी। अब न तो मिट्टी खोदने के लिए जाते है और न ही किसी पास इतनी फुर्सत है कि मिट्टी के बर्तन बनाये जाये। बाजार में सबकुछ मिल जाता है। चूल्हे व माता पूजन के लिए बनाये जाने वाली मिट्टी की सामग्री बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाती है। 

तेल-हल्दी 

पहले विवाह के दौरान तेल और हल्दी चढाने की रस्म की जाती थी। अब पोर्टेबल सामानों से सारी परंपराओं का निर्वहन हो जाता है। मूसल, बेलन, रवई, कंघी इत्यादि सामग्री पोर्टेबल हो गई है। 

चौकी (पटिया)

पूजन-अर्चन के लिए लडकी के पटियों का उपयोग किया जाता था। बाजार में अब बनी बनाई चौकी मिल जाती है। खास बात यह है कि चौकी अब सिल्वर की मीनाकारी से सजी नजर आती है।

तोरण

दूल्हा जब दुल्हन के घर में प्रवेश करता था तो तोरण मारने की परंपरा का निर्वहन किया जाता था। परंपरा आज भी बरकरार है पर अब बाजार में ही लकडी के छोटे तोरण, सीट और वेलवेट में जरदोजी वर्क से सजे आने लगे है। मजेदार बात यह है कि तोरण पर बने रहने वाला पक्षी भी अब पेपर पर उतर आया है। पहले कारीगर लोग तोरण बनाकर लाते थे। तोरण मारने की रस्म में काम आने वाले बांस के बेलन, मूसल और रवई भी अब आकर्षक साज-सज्जा में मिलने लगे है। 

सूपडे

सात वचनों के साथ, सात जन्म के बंधन में बंधने की शुरूआत जब फेरों से की जाती है तो बांस से बने हुए सूपडे की आवश्यकता होती है। पहले बांस से बने हुए बडे-बडे सूपडे उपयोग में लाये जाते थे। सूपडे अब भी बांस से बन रहे है मगर उनका आकार खिलौनों में तब्दील हो गया है। वेलवेट और गोट से सजे हुए सूपडे भी बाजार में मिल जाते है।

गुम हुआ साफा, बनी बनाई पगडी का रिवाज

घर में बेटे की शादी हो और दूल्हा जब घोडी पर सवार होकर दुल्हन लेने के लिए निकले तो मस्तक पर जब तक साफा न हो रंग ही नहीं जमता था। हालात यह थे कि साफा बंधवाने के लिए बडे-बुजुर्गो को बुलाया जाता था। वक्त के साथ साफा शादी से लगभग गोल हो गया है। बाजार में रेडीमेड साफों की भरमार है। आजकल बाजार में सिल्क, कुंदन वर्क, जरदोजी व अन्य तरह के सजे हुए साफे नजर आते है। दूल्हे के साफे पर लगने वाले मोड और कलंगी का आकार भी छोटा हो गया है।