आज 5 फरवरी 2020 को मनेगी जया एकादशी

वैदिक पंचांगनुसार माघ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी मनाई जाती है।तदानुसार, 5 फरवरी 2020 को इस वर्ष जया एकादशी मनाई जाएगी। वर्ष के प्रत्येक माह में 2 एकादशी व्रत मनाई जाती है। जया एकादशी व्रत करने से व्रती को घोर पापों से मुक्ति मिलती है। जया एकादशी व्रत को पद्म पुराण में उल्लेखित किया गया है। इस व्रत के करने से मनुष्य जाति को अधम योनि से मुक्ति मिलती है। इस व्रत को करने से पिछले कार्मिक दोषों से मुक्ति मिल सकती है और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए जया एकादशी को खास माना जाता है। ये व्रत करने से जाने-अनजाने में किए गए पापों से भी छुटकारा मिल सकता है


यह रहेगा जया एकादशी शुभ मुहूर्त ---


जया एकादशी की तिथि: 5 फरवरी 2020 ..


एकादशी तिथि प्रारंभ: 4 फरवरी 2020 को रात 9 बजकर 49 मिनट से ...


एकादशी तिथि समाप्‍त: 5 फरवरी 2020 को रात 9 बजकर 30 मिनट तक..


पारण का समय: --
6 फरवरी 2020 को सुबह 7 बजकर 7 मिनट से 9 बजकर 18 मिनट तक।


यह हैं जया एकादशी व्रत की कथा --
एक बार की बात है। स्वर्ग के निहित नंदन वन में उत्स्व मनाया जा रहा था। इस अवसर पर समस्त देवगण, सिद्धसंत तथा दिव्य पुरुष उपस्थित थे। नंदन वन में उस समय गायन तथा नृत्य कार्यक्रम गन्धर्व और गन्धर्व कन्याएं प्रस्तुत कर रहे थे । उत्स्व के गायन तथा नृत्य कार्यक्रम के अवधि में नृतका पुष्यवती की नजर ज्यो माल्यवान पर पड़ी, पुष्यवती उस पर मोहित हो गई। 


तत्पश्चात, पुष्यवती सभा तथा उत्स्व की मर्यादा को भूलकर ऐसा नृत्य करने लगी की माल्यवान भी उस पर मोहित हो गया और अपनी सुध खोकर बेसुरा गाने लगे। जिससे सभा की मर्यादा भंग हो गयी। गन्धर्व के इस कार्य से स्वर्ग के स्वामी अति क्रोधित हो उठे और उन्होंने दोनों को तत्काल ही स्वर्ग से वंचित कर दिया। इंद्र देव ने कहा, आप दोनों को अधम नीच योनि प्राप्त हो। 


स्वर्ग के स्वामी इंद्र देव के श्राप से दोनों पिशाच बन गए और हिमालय पर्वत पर निवास करने लगे। यहाँ दोनों को अत्यंत कष्ट भोगना पड़ता था। जिससे दोनों काफी दुखी हो उठे। एक बार माघ माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी को दोनों इस दुःख से कुछ भी नही खाया तथा दिन भर भूखे-प्यासे वृक्ष की शाखा पर बैठे रहे। रात्रि काल में उन्होंने फल खाया परन्तु स्वर्ग के सुख और शांति के लिए दोनों ही लालायित थे जिस कारण रात्रि में भी दोनों जागते रहे तथा श्री हरी विष्णु का स्मरण करते रहे। इस तरह उन दोनों ने विधि-विधान से जया एकादशी का व्रत किया जिससे भगवान श्री हरि विष्णु अति प्रसन्न होकर दोनों को पिशाच योनि से मुक्त कर दिया। 
एक मान्यता यह भी है कि जो जया एकादशी का व्रत और विधिवत पूजा करता है उसे भूत, प्रेत, पिशाच जैसी योनियों में नहीं भटकना पड़ता है।


जया एकादशी का महत्व --
भगवान श्री कृष्ण जी ने सर्वप्रथम जया एकादशी के महत्व को धर्मराज युधिष्ठिर से बताया था। भगवान श्री कृष्ण जी कहते है की इस व्रत को करने से व्यक्ति अधम योनि अर्थात भूत, प्रेत, पिसाच आदि योनि से मुक्त हो जाता है।
 जया एकादशी समस्त एकादशियों में बहुत महत्वपूर्ण मानी गई है क्योंकि यह सर्वत्र जीत दिलाती है। जया एकादशी के बारे में कहा जाता है कि जहां मनुष्य का भाग्य भी साथ नहीं देता, वहां जया एकादशी का व्रत प्रत्येक काम में जीत दिलाने में मदद करता है। जया एकादशी  के दिन गन्ने के रस का फलाहार किया जाता है।हिंदू भक्त एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी तिथि (12वें दिन) के सूर्योदय तक निर्जला उपवास रखते हैं. उपवास करते समय व्यक्ति को क्रोध, वासना या लालच की भावनाओं को अपने दिमाग में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए।


यह व्रत शरीर और आत्मा दोनों को शुद्ध करने के लिए है. इस व्रत के पालनकर्ता को द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और उसके बाद उनका व्रत तोड़ना चाहिए. व्रत रखने वाले को पूरी रात नहीं सोना चाहिए और भगवान विष्णु की प्रशंसा करते हुए भजन गाना चाहिए।ऐसे लोग जो पूर्ण उपवास का पालन नहीं कर सकते, वे भी दूध और फलों पर आंशिक उपवास रख सकते हैं. यह अपवाद बुजुर्ग लोगों गर्भवती महिलाओं और गंभीर शारीरिक बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए है.जया एकादशी का व्रत न रखने वालों को भी चावल और सभी प्रकार के अनाज से बने भोजन खाने से परहेज करना चाहिए. शरीर पर तेल लगाने की भी अनुमति नहीं है।


जया एकादशी व्रत विधि--
व्रती को माघ माह में शुक्ल पक्ष की दशमी को एक समय आहार करना चाहिए। इस दिन लहसन, प्याज, तामसी भोजन का त्याग करना चाहिए। जया एकादशी के दिन स्नान आदि से निवृत होकर भगवान श्री हरि विष्णु का ध्यान करते हुए संकल्प ले। तत्पश्चात धुप, दीप, चन्दन, फूल, फल, तिल एवम पंचामृत से भगवान की पूजा करे।
जया एकादशी व्रत की पूजा विधि---
अगर आप इस दिन व्रत करना चाहते है तो, ब्रह्मा मुहूर्त में स्नान कर सबसे पहले विष्णु भगवान का ध्यान करना चाहिए, उसके बाद एकादशी का संकल्प करना चाहिए। एक साफ़ सुथरे स्थान पर लाल कपडा  बिछाये और फिर उसपर  भगवान विष्णु की फोटो फ्रेम या प्रतिमा रखें। फिर गंगाजल में तिल मिलकर चरों तरफ अक्षत के छींटे फेंके। और फिर उसके बाद धुप और दीप जलाये और भगवान् विष्णु को फूल चढ़ाये। भगवान विष्णु का पाठ करें और फिर आरती करें। भगवान विष्णु को तिल का भोग लागए। इस दिन तिल को शुभ माना जाता है तो इसलिए आप इस दिन तिल को दान में भी दे सकते हो। अगले दिन सुबह भगवान् श्रीकृष्ण का पूजा करके ब्राह्मण को भोजन कराये और उन्हें दान में कुछ भी दें। इसके बाद ही आपका व्रत पूरा होगा।